तरकश

'तरकश' में कई तरह के तीर होते हैं जो जानलेवा, घातक या कम घातक हो सकते हैं। नाम के अनुरूप ऐसे हीं लेख आपको मेरे ब्लॉग में पढ़ने को मिलेंगे।

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पर्यावरण और शाकाहार

Posted On: 5 Jun, 2015 Others,न्यूज़ बर्थ,Others में

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बदलता हुआ मौसम हमें चेता रहा है, संभल जाओ वरना जीवन का ‘अंत’ आ रहा है! जलवायु परिवर्तन की वजह से बेमौसम बारिश और धरती का बढ़ता तापमान अगर आपको चिंतित करता है तो ये पोस्ट आपके लिए है। पर्यावरण को बचाने की मुहिम लगातार चल रही है। इस मुहिम में हम सबकी भागीदारी बेहद जरूरी है। 2050 तक विश्व की जनसंख्या 9.6 अरब पहुंच जाने का अनुमान है और अगर प्राकृतिक संसाधनों को ऐसे ही उपभोग जारी रहा तो हमें जीने और अपने उपभोग के लिए पृथ्वी जैसे तीन और ग्रहों की जरूरत होगी? ज़ाहिर है कि पृथ्वी  और उसका पर्यावरण बचाने के लिए हमें हर हाल में, हर स्तर पर प्रयास करना होगा। पर्यावरण के लिए जनसंख्या नियंत्रण सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। खान-पान में बदलाव भी पर्यावरण के लिए बहुत जरूरी है। आपसे कोई पूछे कि शाकाहार और मांसाहार का पर्यावरण से कोई संबंध है? तो हो सकता है कि कुछ क्षणों के लिए आप सोचने लग जाएं कि मांसाहार या शाकाहार से पर्यावरण का क्या लेना-देना? लेकिन संबंध है। शाकाहारियों को ये जानकार अच्छा लगेगा कि शाकाहार के चलते वो पर्यावरण की भी रक्षा कर रहे हैं जबकि मांसाहार के चलते पर्यावरण के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

2012 में हुए एक अध्ययन में कहा गया है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के द्ष्परिणामों से बचने के लिए मांस की खपत 50 प्रतिशत तक कम करनी होगी। एनवायरमेंटल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि ग्लोबल वार्मिग के खतरे से बचने के लिए वर्ष 2050 तक खाद्य उत्पादन और भोजन की आदतों में महत्वपूर्ण बदलाव की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए यह सबसे कठिन चुनौती है कि खाद्यान उत्पादन से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कैसे कमी लाई जाए? 2012 में मैसाच्युसेट्स के वुड्स होल रिसर्च सेंटर के निदेशक इरिक डेविडसन के अध्ययन में कहा गया है कि विकसित देशों को खाद के प्रयोग में 50 प्रतिशत कमी करनी होगी और लोगों को मांसाहारी भोजन में कटौती करनी होगी। विकसित देशों में लोग नियमित रूप से मांस खाते हैं। वहीं भारत और चीन में समृद्धि बढ़ने के साथ ही मांस के खपत में वृद्धि हुई है। मांस उत्पादक  कारखाने जल प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोत के रूप में सामने आए हैं। दिलचस्प तथ्य ये भी है कि एक पौंड मांस के उत्पादन में 2500 गैलन पानी की खपत होती है जबकि एक पौंड गेंहूं के उत्पादन में मात्र 25 गैलन पानी की आवश्यकता होती है। इनके अलावा भी मांसाहार के चलते पर्यावरण को बहुत नुकसान हो रहा है।

उपर्युक्त तथ्यों के संदर्भ में कहा जाए तो मांसाहार से पर्यावरण को बहुत बड़ा खतरा है। जाहिर है पृथ्वी की स्वभाविकता और मानव सभ्यता को बचाने के लिए मांसाहार कम से कम करना होगा और विश्व समुदाय को शाकाहार अपनाना होगा। दूसरी महत्वपूर्ण बात, पर्यावरण के लिए केवल शाकाहार अपनाना ही काफी नहीं हैं। जल संरक्षण करना, जल व वायु प्रदूषण में अपना योगदान शून्य पर लाना, और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग बेहद जरूरी है। प्रकृति से छेड़छाड़ को जितना जल्द बंद कर दिया जाए उतना अच्छा होगा। पर्यावरण को बचाने में हम सब की भागीदारी की जरूरत है। आने वाली पीढ़ी के लिए हमें अपनी इस ज़िम्मेदारी को जरूर निभाना चाहिए और व्यक्तिगत स्तर पर पर्यावरण को बचाने में ज्यादा से ज्यादा योगदान दें।

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पर्यावरण पर कुछ दोहे-

1- हरी-भरी वसुंधरा का नहीं कोई विकल्प,

इसे बचाने का आओ सभी करें संकल्प।

2- व़क्षारोपण कर, करो धरा का श्रंगार,

पर्यावरण हितैषी बन, करो उपकार।

3- पर्यावरण को हमें हर हाल में बचाना है,

आने वाली पीढ़ी को देना ये नज़राना है।

4- जल-थल और नभ ही हैं जीवन का आधार,

इनको प्रदूषित कर प्राप्त उन्नति है बेकार।

5- प्लास्टिक की वस्तुओं का करो तिरस्कार,

स्वच्छ पर्यावरण का सपना होगा साकार।

6- आबादी है बहुत ही ज्यादा, पानी है कम,

पानी बर्बाद हो गया तो कैसे जिएंगे हम।

7- ज़हर हवा में इतना, मुश्किल है लेना सांस,

इसे न रोक पाए तो, छोड़ो जीने की आस।

8- करीब 1.6 बिलियन लोग हैं जंगलों पर निर्भर,

पेड़ों की कटाई से हो रहा है उनका जीना दूभर।

नोट- ये पोस्ट दैनिक अख़बारों में आई रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार की गई है। दोहे मैंने खुद लिखे हैं।

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